“भैया-भैया दो रूपये दो ना....."
जूस की दुकान पर बैठे मेरी नजर अनायास ही उस छोटू की ओर खिंची चली गई जो सड़क के किनारे पैदल आने-जाने वाले लोगों के सामने हाथ फैलाये बार-बार यह दोहराए जा रहा था ,तो कभी चौराहे के सिग्नल पर रुकने वाली गाड़ियों के शीसे पर अपने नन्हे हाथ मार रहा था...
उम्र महज सात–आठ साल ,आइने सी साफ़ आँखे शायद सपने देखना जिनके मुकद्दर में नहीं ,धूल में सने हल्के भूरे सुनहरे बाल ,पैरों के नाप से छोटी चप्पलें ,कद से बड़े कपडे जिनका रंग पहले क्या रहा होगा किसे पता, लेकिन वक्त की धूल ट्रैफिक के धुएं और गरीबी के मैल से बेरंग हो चुके थे ,बिना हुक के पेंट को धागे के जुगाड़ से अटकाए वो अपने चेहरे के उदास और लाचार हावभाव बनाये लोगों को कुछ पैसे देने पर मजबूर करने की नाकाम कोशिश कर रहा था.....
हाथ ऊपर उठाकर इशारे से पास बुलाया तो फ़ौरन दौड़ा चला आया...
“भैया.... पांच रूपये दो ना”
“क्या रे ..!अभी तो दो बोल रहा था ,तेरी डिमांड तो बढे ही जा रही है ,क्या करेगा पांच रूपये का ?” मजाकिया अंदाज में मैंने
पूछ लिया
“भैया दो
ना रूपये दो ना” वो अपनी
रट को पकडे था और मैं अपनी...
“ क्या
करेगा ?...पहले बता ”
चारो ओर नजर घुमाने के बाद उसकी नजर जूसर की तरफ जा रुकी और हाथ से इशारा कर सवाल से मुक्ति पा ली ,लेकिन लगा जैसे शायद उसे अपनी जरूरतों का कोई अंदाजा नही , जो मिल जाये उधर हो लिए...
चारो ओर नजर घुमाने के बाद उसकी नजर जूसर की तरफ जा रुकी और हाथ से इशारा कर सवाल से मुक्ति पा ली ,लेकिन लगा जैसे शायद उसे अपनी जरूरतों का कोई अंदाजा नही , जो मिल जाये उधर हो लिए...
“एक गिलास
और लगाना अंकल” जैसे ही
मैंने आवाज लगाई चेहरे पर मुस्कान लिए दौड़कर उसके पास जा लिया |
वो मुस्कुराहट,आशा,उम्मींद जिसे हम कभी एक
गिलास जूस की कीमत में नही खरीद सकते |
यूं तो रोज देखता हूँ अक्सर जयपुर की सड़कों,गली-नुक्कड़,चौराहे पर इनकी भरमार है लेकिन इतने करीब
से समझने का पहले कभी मौका नहीं मिला या यूं कहो कोशिश नहीं की
एक पल के लिए मैं जरा खो गया था तभी छोटू जूस पीकर कब आँखों से
ओझल हुआ कुछ पता ना चला....
एक छोटू जरा जहन से निकला नही था की नजर बाहर एक वैसी ही लड़की पर पड़ी
जो एक हाथ से गोद में नन्हे बच्चे को संभाले दूसरा हाथ फैलाये घूम रही थी , जिसके आगे
सिग्नल पर रुकी गाड़ियों के बीच से निकलते ,गुलातियाँ मारते,
करतब दिखता हुआ एक और छोटू !!
देखकर दिल सहम सा गया...
“हम तरक्की ,डेवलपमेंट की कितनी भी शेखियां क्यों ना मारते हों लेकिन हमेशा सच्चाई के इस पहलु को नजरअंदाज कर देते है....भले ही आज हम विकसित देशों की श्रेणी में शामिल होने जा रहें हो , भले ही अरबों का बजट लगाया जाता हो लेकिन इनके हिस्से का सूरज राजनेताओं के स्वार्थ की दीवारों के पीछे छुप जाता है और इन्हें फिर से अँधेरे ही नसीब होता है ,जिसका फायदा समाजसेवक का चोला पहने कुछ लोग NGO की आड़ में काला धंधा करके उठाते हैं, पिछले दशक में सरकार की अनदेखी और गलतियों को हाल ही में सुधारा गया ,4470 NGO के लायसेंस जून और तकरीबन 9000 अप्रेल में रद्द किये गये जिसके बावजूद राजधानी दिल्ली में एक NGO में बच्चो की ऑनलाइन खरीद फरोक सामने आई |
बात यहीं ख़त्म नहीं हो जाती जो छोटू हम बस स्टॉप ,रेलवे स्टेशन और कचरे के ढेरों में थैला लिए देखते हैं यही छोटू चूड़ी कारखानों , डेयरी उद्योगों , चाय की दुकानों और छोटी –बड़ी होटलों में बालश्रम करते मिलते हैं | ये हाल सिर्फ जयपुर का ही नहीं, बड़े स्लम एरिया... धारावी स्लम मुंबई ,इंदिराम्मा (हैदराबाद),राजेंद्रे नगर (बंगलोर), भलस्वा (दिल्ली) ,कोलकाता ,सरोज नगर (नागपुर) ,मेह्बुल्लाह्पुर (लखनऊ),भोपाल ,अहमदाबाद में इनकी तादाद का अंदाजा लगाना नामुमकिन है ....
आज पल भर के लिए समझना चाहा ,तो इतने सवालों में उलझ गया.........
आखिर कब तक छोटू हाथ फैलाने को मजबूर रहेगा ,
कब तक कारखानों की
खिडकियों से स्कूल जाते बच्चों को देख अपनी किस्मत पर रोयेगा ,
कब रोज अखबार बांटने वाला छोटू उसमे लिखे अक्षरों को पढ़ सकेगा,
कब आँखे राहगीर की जेब छोड़ सपने देखना सीखेंगी,
कब कंधो पर कचरे के थैले की बजाय स्कूल के थैले होंगे,
आखिर देश की यह तस्वीर कब बदलेगी..????????
कब रोज अखबार बांटने वाला छोटू उसमे लिखे अक्षरों को पढ़ सकेगा,
कब आँखे राहगीर की जेब छोड़ सपने देखना सीखेंगी,
कब कंधो पर कचरे के थैले की बजाय स्कूल के थैले होंगे,
आखिर देश की यह तस्वीर कब बदलेगी..????????


सत्य लिखा आपने - हम सब अपने चारो तरफ़ एक नकली दुनियाँ बनाकर जी रहे हैं और इस बात को देखना नहीं चाहते
ReplyDeleteशुक्रिया भाई..........
ReplyDeleteबहुत शानदार चित्रण किया है भाई । बाँध दिया शब्दों की डोर से, कहीं भी ऐसा ख्याल नहीं आया कि बाद में पढ़ लूँगा। बाल मजदूरी और शोषण के आंकड़े वास्तव में भयावह हैं इस "डिजिटल इण्डिया" के लिए।
ReplyDeleteशुक्रिया भाई........😊😊
DeleteBohot umda likha aapne. Kahin padha tha maine- "Ye chotu, aksar apne ghar ke bade hote hain."
ReplyDeleteशुक्रिया अंकिता जी.....:-)
DeleteExcellent .....
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