Sunday, September 21, 2014

एक मुलाकात पलकों के पीछे

एक ख्याल सा लगाया था बस,
सोने से पहले सिरहाने

और तुमने दस्तक दे ही दी,
आखिर कब तक इंतजार करवाती
खुद भी तो बैचेन रहती हो

वो तुम्हारे मखमली हाथो को
आँखों पर रखने की शरारत ,
महकती जुल्फों की खुशबू ने
तुम्हारे होने की गवाही दे दी

और तुम फिर परेशान सी बैठ गई,

"आखिर इतने दिनों बाद भी भूले नहीं,
आहटें हमारी ? और बाल बनाना आज भी भूल गए"
बच्चों सी मासूमियत होटो पर लिए हंस पड़ी ।

"बनाकर ही आया था पगली, देरी से आई ना तुम, तो रूंठ गए हैं तुमसे बस "
हल्की सी मुस्कान से कहा मैंने ।

"तो कहाँ खर्च करते हो प्यार ?, जो हमसे कमाया था कभी "कुछ रुखे अंदाज से पूछा उसने

"की थी कोशिशें कई बार
कभी कागज पर तस्वीर उतारने में
तो कभी कुछ अल्फाज उतारकर बिताने में,
दोस्तों को तेरे पागलपन के किस्से सुनाने में,
 तो कभी
एक बोतल शराब के साथ रात बिताने में,
लेकिन कम्बख्त पूंजी तेरे इस्क की है जो कम होने का नाम नहीं लेती"
पलकें झुकाए सफाई दिए जा रहा था
कुछ नहीं बोली बस खामोश थी वो

"जब  नजरें उठाई तब तक जा चुकी थी
हमेशा की तरह रुठकर हमसे,
शायद उन्हें मनाने का हुनर हमें आज भी नहीं आया"

"अभी भी रोज इसी इंतजार में बंद कर लेते हैं पलकें अपनी ,क्या पता शायद तुम इंतजार कर रही होगी फिर उन्हीं पलकों के पीछे "

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