Saturday, March 28, 2015

मेरे शहर में...


"तूं" और "मैं" में बंटते गये लोग~
"हम" का वजूद ख़त्म हुआ कुछ इस कदर मेरे शहर में....

बदलते रंग ,सूरत वक्त के साथ लोग यहां~
गिरगिट तो हुआ बदनाम यूं ही मेरे शहर में....

बदलते हैं रुख हवाओं की तरह लोग यहाँ~
है मुश्किल करना यकीं किसी पर मेरे शहर में......

छोड़ने लगी हैं सांसे साथ चंद हादसों में~
दुआएं नहीं करता कोई अब मेरे शहर में ... 

कहने को हैं लोग बहुत~
पर ढूंढे से मिलता नहीं इंसान मेरे शहर में......


भटकता है दर-बदर वक्त दो वक्त की रोटी तलाशते~
हर किसी का मुकद्दर फ़क़ीर सा हुआ अब मेरे शहर में.....

एक ही छत के नीचें खिंच जाती हैं दीवारें कई~
नीवं रिश्तों की मजबूत नहीं होती मेरे शहर में........||

9 comments:

  1. लिखना तो बहुत कुछ है लेकिन समझ नहीं पायेंगे मेरे शहर के लोग

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  2. खो गया भाई चारा..
    नहीं कोई यहाँ हमारा..
    ढूंढते रह गए वजूद अपना..
    यही होता आया सदा.. मेरे शहर में :)))

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  3. वर्तमान परिस्थतियों के अनुरूप.. बहुत खूब..👍

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  4. वर्तमान परिस्थतियों के अनुरूप.. बहुत खूब..👍

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  5. कितनी है इमारते है हर गली में
    मगर घर अब नहीं मिलता इस शहर में।
    बूढ़े माँ बाप तो है हर किसी किसी के
    मगर घर अब नहीं है उनके लिए इस शहर में।

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    1. वह भाई.....खुबसूरत...


      शुक्रिया...

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