"तूं" और "मैं" में बंटते गये लोग~
"हम" का वजूद ख़त्म हुआ
कुछ इस कदर मेरे शहर में....
बदलते रंग ,सूरत वक्त के साथ लोग यहां~
गिरगिट तो हुआ बदनाम यूं ही मेरे शहर में....
बदलते हैं रुख हवाओं की तरह लोग यहाँ~
है मुश्किल करना यकीं किसी पर मेरे शहर में......
छोड़ने लगी हैं सांसे साथ चंद हादसों में~
दुआएं नहीं करता कोई अब मेरे शहर में ...
कहने को हैं लोग बहुत~
पर ढूंढे से मिलता नहीं इंसान मेरे शहर में......
भटकता है दर-बदर वक्त दो वक्त की रोटी तलाशते~
हर किसी का मुकद्दर फ़क़ीर सा हुआ अब मेरे शहर में.....
एक ही छत के नीचें खिंच जाती हैं दीवारें कई~
नीवं रिश्तों की मजबूत नहीं होती मेरे शहर में........||
नीवं रिश्तों की मजबूत नहीं होती मेरे शहर में........||
लिखना तो बहुत कुछ है लेकिन समझ नहीं पायेंगे मेरे शहर के लोग
ReplyDeleteखो गया भाई चारा..
ReplyDeleteनहीं कोई यहाँ हमारा..
ढूंढते रह गए वजूद अपना..
यही होता आया सदा.. मेरे शहर में :)))
बहुत खूब दीदी...
Deleteवर्तमान परिस्थतियों के अनुरूप.. बहुत खूब..👍
ReplyDeleteवर्तमान परिस्थतियों के अनुरूप.. बहुत खूब..👍
ReplyDeleteथैंक्यू......दीदी ..
Deleteकितनी है इमारते है हर गली में
ReplyDeleteमगर घर अब नहीं मिलता इस शहर में।
बूढ़े माँ बाप तो है हर किसी किसी के
मगर घर अब नहीं है उनके लिए इस शहर में।
वह भाई.....खुबसूरत...
Deleteशुक्रिया...
shi likha h
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