यूं ना करते तुम छुप-छुपकर हमसें बेवफाई,
शायद हमारी ही मोहब्बत में कुछ कमी रही होगी...
शिद्दत से चाह कर भी न पा
सके तुम्हे,
शायद हमारी दुवाओं में कुछ
कमी रही होगी....
भटकते मुसाफिर को भी मिल
जाती है मंजिल यहाँ
शायद राह ही हमारी मंजिल
रही होगी....
सुना है आँखें आँखों से दिल
की बाते पढ लेती हैं,
शायद यह भी हमारी ही आँखों की कमी
रही होगी...
कहाँ बसती नींद है इन आँखों
में अब,
शायद कुछ राते तेरी
गुनाहगार रहीं होंगी...
छोड़ गये कुछ निशान पैरों के
,
निकले जब तुम दिल की डगर से..
शायद हमारी ही डगर पे मिटटी
कच्ची रही होगी....
बहुत खुब भाई
ReplyDeleteशुक्रिया भाई ....
Deleteतुम्हारी डगर कच्ची पक्की थी और हमें तो सड़क भी मखमल की चाहिए थी।
ReplyDeletewah.......!!
Deleteshbdo ki kami hai tariff me aapke kuchh kahne ke liye
ReplyDeletemagar duaa hai rab se aap yu hi jag me roshan hote rahe
thank you bhai....aap sb se padhkar ke likhna seekhe h ,thoda bhut
Deleteचाह कर भी तक ना पाये हम राह उनकी
ReplyDeleteधुंधली हुई नज़र शायद, कहीं नमी रही होगी
कुछ कुछ लिखते हैं...कभी नज़रे इनायत कीजिये..
ReplyDeletea.joshi 1967@WordPress.coma
G bilkul
Deleteकुछ कुछ लिखते हैं...कभी नज़रे इनायत कीजिये..
ReplyDeletea.joshi 1967@WordPress.coma
चाह कर भी तक ना पाये हम राह उनकी
ReplyDeleteधुंधली हुई नज़र शायद, कहीं नमी रही होगी
चाह कर भी तक ना पाये हम राह उनकी
ReplyDeleteधुंधली हुई नज़र शायद, कहीं नमी रही होगी
चाह कर भी तक ना पाये हम राह उनकी
ReplyDeleteधुंधली हुई नज़र शायद, कहीं नमी रही होगी
चाह कर भी तक ना पाये हम राह उनकी
ReplyDeleteधुंधली हुई नज़र शायद, कहीं नमी रही होगी
Kya likhta h hero...
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