Wednesday, April 22, 2015

शायद...

यूं  ना करते तुम छुप-छुपकर हमसें बेवफाई,
शायद हमारी ही मोहब्बत में कुछ कमी रही होगी...

शिद्दत से चाह कर भी न पा सके तुम्हे,
शायद हमारी दुवाओं में कुछ कमी रही होगी....

भटकते मुसाफिर को भी मिल जाती है मंजिल यहाँ
शायद राह ही हमारी मंजिल रही होगी....

सुना है आँखें आँखों से दिल की बाते पढ लेती हैं,
शायद यह भी हमारी ही आँखों की कमी रही होगी...

कहाँ बसती नींद है इन आँखों में अब,
शायद कुछ राते तेरी गुनाहगार रहीं होंगी...


छोड़ गये कुछ निशान पैरों के ,
निकले जब तुम दिल की डगर से..

शायद हमारी ही डगर पे मिटटी कच्ची रही होगी....

15 comments:

  1. बहुत खुब भाई

    ReplyDelete
  2. तुम्हारी डगर कच्ची पक्की थी और हमें तो सड़क भी मखमल की चाहिए थी।

    ReplyDelete
  3. shbdo ki kami hai tariff me aapke kuchh kahne ke liye
    magar duaa hai rab se aap yu hi jag me roshan hote rahe

    ReplyDelete
    Replies
    1. thank you bhai....aap sb se padhkar ke likhna seekhe h ,thoda bhut

      Delete
  4. चाह कर भी तक ना पाये हम राह उनकी
    धुंधली हुई नज़र शायद, कहीं नमी रही होगी

    ReplyDelete
  5. कुछ कुछ लिखते हैं...कभी नज़रे इनायत कीजिये..
    a.joshi 1967@WordPress.coma

    ReplyDelete
  6. कुछ कुछ लिखते हैं...कभी नज़रे इनायत कीजिये..
    a.joshi 1967@WordPress.coma

    ReplyDelete
  7. चाह कर भी तक ना पाये हम राह उनकी
    धुंधली हुई नज़र शायद, कहीं नमी रही होगी

    ReplyDelete
  8. चाह कर भी तक ना पाये हम राह उनकी
    धुंधली हुई नज़र शायद, कहीं नमी रही होगी

    ReplyDelete
  9. चाह कर भी तक ना पाये हम राह उनकी
    धुंधली हुई नज़र शायद, कहीं नमी रही होगी

    ReplyDelete
  10. चाह कर भी तक ना पाये हम राह उनकी
    धुंधली हुई नज़र शायद, कहीं नमी रही होगी

    ReplyDelete