Tuesday, December 1, 2015

बैरन रातें बड़ी होने लगी हैं.. और हों भी क्यों ना दिसम्बर जो शुरू होने को आया....

यूं तो जयपुर में हर मौसम ख़ुशमिज़ाज हुआ करता है ,लेकिन यहाँ की हल्की गुलाबी ठंड का मज़ा ही कुछ और है........दिनभर की थकान दूर हो जाती है ,जब रात के दो बजे ग़रम कोफ़ी का कप पकड़े ,बालकनी से शहर को बर्फ़ की तरह जमें हुए शांत देखता हूँ....वो लम्हा....हाँ वो एक छोटा सा लम्हा जीने का दिल करता है ,क्योंकि उस लम्हे में.. मैं सबसे तन्हा होता हूँ ,और तुम मेरे सबसे क़रीब....

-राजस्थानी छोरा

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