यूं तो कहने को यहां
कैंटीन जैसा कुछ...बस छत के नीचे कुछ बैंच रखीं हैं और अंदर को ओर एक छोटी सी
दुकान फिर भी नाम "स्टार कैंटीन" ,और वही एक छोटू जो अक्सर ऐसी दुकानों पर हर जगह
मिल जाता है...एक हाथ में केटली और दुसरे हाथ में खाली गिलास लिए लोगों को सुकून
भरी चुस्कियां बांटता हुआ........
अक्सर इंजीनियर भाई अपने कॉलेज के चार साल ऐसी ही
किसी कैंटीन की बेंचों पर बैठकर सिगरेट और चाय को हाथों में थामें हुए शाम का मज़ा
लिया करतें हैं और शायद यहीं कहीं ही जुड़ जाती हैं जिन्दगी भर के लिए कुछ यादें......
हर शाम जब भी
दोस्तों के साथ जाते तो कुछ नयें चहरे मिल जाते.......लेकिन एक शख्स जो रोज उन्ही
बैंचों पर बैठा मिलता...वो थे “बाबूजी“ सुना था पहले किसी सरकारी दफ्तर में
टाइपराइटर हुआ करते थे इसलिए सभी उन्हें “बाबूजी” कहा करते थे...
चहरे की झुर्रियों
जिन्दगी के अनुभव को साफ़ दर्शाती थी | आँखों की गहराई में दफ़न कुछ मजबूरियों को
चश्में के लेंस के नीचे छुपाये वो सबसे बड़े ही मिलनसार और मजाकिया अंदाज़ में पेश
आते और यही बात थी कि कैंटीन में बाबूजी के चाहने वाले खूब थे....अक्सर शाम के वक्त
बाबूजी वहीँ मिलते...और रात होते खाना खाकर चल देते...
रोज मिलते – मिलते
बाबूजी से दोस्ती सी हो गई थी...हर शाम वो अपने पुराने दफ्तर के किस्से सुनते और
हम सभी दोस्त बाबूजी के चारों ओर घेरा डालकर बैठ जाते..इसी बीच कब वक्त बीत जाता
कुछ पता ही नहीं चलता.....अब तो हर शाम जैसे यह कोई जिन्दगी का हिस्सा सा बन गया
था बाबूजी भी हमारे आने का इंतजार करते....
कभी – कभी जहन में
बहुत से सवाल आते कि आखिर बाबूजी की इतनी उम्र हो गई है फिर भी वो घर में बना खाना
क्यों नहीं खाते ?क्या उनके घर पर देखभाल करने वाला कोई नहीं है ?क्या घर पर उनकी
बाते सुनाने वाला कोई नहीं ?लेकिन कभी पूछना मुनासिब नहीं समझा.. कैंटीन आकर अगर
बाबूजी के चहरे पर मुस्कुराहट आती है तो उसे किरकिरा करना ठीक नहीं था
आज शाम हम कुछ देरी
से आये....आज बाबूजी नये कपड़ो में ऐकले बैठे नजर आ रहे थे एसे कपड़ों में पहले उन्हें कभी नहीं देखा था | “किसी
शादी – पार्टी में जाकर आ रहे होंगे या किसी खास काम से लौटे होंगे ’’ मेने सोचा |..लेकिन
इतने चुप और शांत उन्हें पहले कभी नहीं देखा था अक्सर किसी ना किसी से मस्करी जरुर
करते मिलते थे....अजीब सी ख़ामोशी थी उनके चहरे पर आज...
मैं पास राखी कुर्सी खिसकाकर सामने बैठ गया..हालत
का जायजा लेने के लिए छेड़ने के अंदाज़ में पूछ लिया “बाबूजी राम-राम !!....क्या बात
है आज शाम इतना बन-ठन के किस पर कहर बरसाने निकले हो ?’’
“अब वो उम्र कहाँ
रही ’’ हल्की सी हंसी के साथ उन्होंने सवाल को किनारे लगा दिया |
“फिर ये सोलह
श्रंगार करके कैंटीन आने के पीछे क्या इरादा है ’’ फिर से वाही सवाल सुन बाबूजी ने
शांत आवाज में जवाब दिया “आज जन्मदिन है मेरा ’’
“हैप्पी बर्थडे
बाबूजी......’’
“शुक्रिया’’
“लेकिन आज भी आप
यहाँ खाना खाओगे ?घर पर पार्टी नहीं है ?.....”
ये पूछकर मानो मेने
उनकी दुखती रग पर हाथ रख दिया हो...
कुछ नहीं बोले...एक पल के लिए लगा जैसे बाबूजी कहीं दूर खो गये
हों .....और मेरे सवाल अनसुना कर दिया हो...
“होने से क्या होता
हैं’’भरी हुई आवाज में उन्होंने जवाब दिया लेकिन जवाब में उनका दर्द झलक पड़ा था......
साथ में बैठे दोस्त
इस विषय में उन्हें और परेशान न कर दूसरी
बातों में उलझाने लगे...
“अच्छा बाबूजी....आपने
पहली बार जन्मदिन कहाँ मनाया था ?”
“आज कितने बरस के हो
चुके”.............................................
सवालों का सिलसिला
चलता रहा इसी बीच एक दोस्त जाकर कुछ दूर बेकरी की दुकान से केक ले आया और छोटू को
सब समझाकर आ गया....
तभी बाबूजी ने आवाज
लगाई “छोटे कहाँ मर गया ?प्लेट नहीं लगी अभी तक”
“लाया बाबूजी” छोटू
दूकान के अंदर से चिल्लाया
हमने बाबूजी को सवालों में उलझा रखा था तभी छोटू ने केक सजाकर बड़ी सफाई से छुपाते हुए बाबूजी के सामने
टेबल पर रख दिया...और सभी ने तालियाँ बजाकर जन्मदिन की मुबारकबाद दी शायद उन्हें इसकी उम्मीद कभी नहीं थी.....
“अरे ! इसकी क्या
जरुरत थी.....तुम लोग भी ना...”
मोमबत्ती की लौ में
उनके चेहरे पर भाव बिलकुल साफ़ चमक रहे थे......और बिना कोई सवाल किये केक काटकर
उन्होंने अपना 56वां जन्मदिन मनाया.....धीरे-धीरे उस छोटी सी जगह में लोगों सी
संख्या बढ़ गई थी आखिर बाबूजी के चाहने वालों की कमी कहाँ थी...देखते ही देखते केक
कब पूरा हुआ पता ही नहीं चला....अगले दिन लास्ट एग्जाम था तो हम बिना अलविदा कहे
ही निकल लिए....
सभी सेमेस्टर
एग्जाम ख़त्म होने की ख़ुशी ख़ुशी में गांव चले गये..
जब लगभग पंद्रह दिन बाद वापस कैंटीन
आये तो बाबूजी वहां नहीं थे....लगा शायद देरी से आने लगे होंगे,कल मिल लेंगे...लेकिन
जब अगले दिन भी नहीं दिखे तो छोटू से पूछ ही लिया
“बाबूजी नजर नहीं आ
रहे आजकल, कहाँ तड़ी पार कर दिया रे छोटे उनको ?”
“पक्का तो पता नहीं....लेकिन
हफ्ते भर पहले आप लोगों के बारे में पूछ रहे थे सुना है उनके बेटे के ट्रान्सफर हो
गया है यहाँ से कहीं और” इतना कहकर छोटू अपने काम में व्यस्त हो गया |
उन्हें आखरी बार ना
मिलने का गम तो था साथ ही फ़िक्र थी कि क्या बाबूजी अब भी किसी कैंटीन में बैठे
होंगें या अपने घर में सब के साथ ?
बाबूजी तो चले गये
लेकिन पीछे बहुत से सवाल छोड़ गये...... आखिर उनकी क्या मजबूरियां रहीं होंगी
कैंटीन आने के पीछे ..... बड़ी विडंबना है जहाँ एक ओर आज हम जितने विकसित हो रहे
हैं वहीँ कहीं न कहीं संस्कारों में
पिछड़ते जा रहें हैं...बुजुर्गों को घर से अपनापन नहीं मिल पाता,जो जिन्दगी भर हर
मुसीबत में हमारे साथ रहे उन्हें जिन्दगी के आखरी मुकाम पर हम ऐकला छोड़ देतें हैं.....ये
कहानी तो सिर्फ एक बाबूजी की है आज न जाने
कितने बाबूजी घर से बाहर कहीं कैंटीन में अपनापन ढूंढ रहे होंगे...
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राजस्थानी छोरा
दुःखद सत्य और अब ऐसे बाबूजी लोगो की संख्या बढ़ती जा रही है
ReplyDeleteइंसानी जज्बातों का खूबसूरत ताना-बाना,प्रशंसनीय
ReplyDeleteइंसानी जज्बातों का खूबसूरत ताना-बाना,प्रशंसनीय
ReplyDeleteशुक्रिया जी...........
Deleteवाह छोरे दिल खुश कर दिया और कही दिल में कुछ पुरानी यादें उभर आयीं
ReplyDeleteशुक्रिया दद्दा ...
Deleteआप की कहानी दिल को छू गयी....
ReplyDeleteशुक्रिया ...........
DeleteAwesome story yrrr
ReplyDeleteथैंक्यू रोहित भाई.................
DeleteBahut umdaa Bhai _/\_
ReplyDeletethankyou bhai.......
Deletebahoot khoob bhai aise hi likhte raho... _/\_
ReplyDeleteथैंक्यू भाई......
Deleteरुला दिया भाई ने आज... बहुत ह्र्दयस्पर्शी कहानी है रे... जुग जुग जियो...
ReplyDeleteरुला दिया भाई ने आज... बहुत ह्र्दयस्पर्शी कहानी है रे... जुग जुग जियो...
ReplyDeleteथैंक्यू दीदी ................
Deletedescribed beautifully bro ! -- bwb
ReplyDeleteथैंक्यू भाई ........
Deleteबहुत खूब भाई तेरे इस लेख से तेरा ये रूप भी देख लिया आज, बेहद ही खूबसूरत, जियो
ReplyDeleteshukriya bhai....Bs aap hi se seekha h...kuch kuch...aage or bhi acha likhne ki kosis krenge.
DeleteBahut khoob , mazaa aa gayaa padh k :-))
ReplyDeletewow...yr,it's just awesome...
ReplyDeleteशुक्रिया.....एग्जाम में ,भी पढने के लिए वक्त निकला...आभारी रहेंगे....
DeleteAchchha likha hai..
ReplyDelete"बड़ी विडंबना है जहाँ एक ओर आज हम जितने विकसित हो रहे हैं वहीँ कहीं न कहीं संस्कारों में पिछड़ते जा रहें हैं.."
Ye sahi baat... nichod hai, puri kahani ka.. aage bhi aese hi likhte rahie..
shukriya bhai... :-)
Deleteअति उत्तम , बढ़िया लिखा , बाबू जी की स्तिथि के जिमेवार लगता है हम ही हैं
ReplyDeleteअपने उन्ही बुजुर्गो को बोलने तक नहीं देते जो हमारी आवाज़ सुनने के लिए
आज भी तरशते है . सब कुछ बदल गया , बुजुर्गों के प्रति व्यवहार भी बदलना चाहिए
ताकि उन्हें लगे की उन्होंने ता उम्र जो किया वो अफ़्सोशजनक नहीं था .
बिलकुल.....बदलते परिवेश ने आज समाज को जिस मोड़ पे लाकर खड़ा किया है ,वहाँ बाबूजी का यह वास्तविक चित्रण है
Deletebahut acche !!
ReplyDeleteवाह...
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