वक्त की धुल यादों के शीशे पर कितनी भी जम जाये तन्हाई की कुछ बूंदें एसे गिरती हैं
की पल भर में ताजा हो जाती हैं ...
कुछ यूं ही हुआ आज सुबह, आँखे खुली तो खिड़की के शीशे पर बारिश की कुछ बुँदे दस्तक दे रही थी …………. कुर्सी को बालकनी की और करके बैठ गया और गिरती हुई बारिश की
बूंदों को देखने लगा, तभी अचानक ख्याल आया, कहीं खिड़की के पास रखी मेज़ पर पड़ी
पुरानी डायरी में स्याही तो नहीं फ़ैल गई ??,हाँ आज वो कुछ भीग सी गई थी ,.........साथ ही उसमे रखी कुछ यादे भी .....उठकर जल्दी से सँभालने लगा ...........कुछ नहीं फैला
था...सिवाय उसमे रखे एक सूखे गुलाब की खुशबू के, जो पन्नो कई यादो को सिमटकर बैठा
था..........ख़ामोशी से मैं उन पन्नो को निहारने बैठ गया, जिन्होंने आज भी तुम्हारी
शरारतों को शब्दों में कैद कर रखा है , कितना वक्त बीत गया...लेकिन जब भी इन पन्नो
को देखता हूँ तो उन लम्हों को वहीं ठहरा हुआ पता हूँ .मनो जैसे कल की ही बात हो
|.............सोचता हूँ तुम भी तो कभी मुझे महसूस करती होगी..... तन्हाई में ही
सही........
-राजस्थानी
बहुत ही बेहतरीन लिखा - मेरी कुछ यादें भीगकर उभर आयी
ReplyDeleteशुक्रिया भाई..........
Deleteअच्छा लिखते हो... पढ़ते हुए लगा की सभी scenes आँखों के आगे चल रहे थे.. keep it up...👍
ReplyDeleteअच्छा लिखते हो... पढ़ते हुए लगा की सभी scenes आँखों के आगे चल रहे थे.. keep it up...👍
ReplyDeleteबिलकुल दीदी आप पढेंगे तो जरुर लिखेंगे.......
Deleteहाँ बिलकुल पढ़ेंगे...😊
ReplyDeleteहाँ बिलकुल पढ़ेंगे...😊
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