लग रहा था मानो अरसे बाद इस भागमभाग से छुट्टी मिली हो दिवाली के बहाने
एक बार फिर जिंदगी जीने के लिए,शहर के ट्रैफिक से दूर गाँव की खुली हवा में सांस लेने के लिए....
जहां बस रुकती है वहाँ कस्बा है एक छोटा सा,मेरे बचपन का या कहिए कुछ पुरानी यादों का कस्बा, और उस पार गाँव ।।
पहुंचते- पहुंचते रात काफी हो चुकी थी ......
गलियाँ सुनसान और निर्जन हो गई थी.
स्वागत को सिर्फ स्ट्रीट लाइट की हल्की रोशनी बची थी,यूं तो काफी जानकारी है इस छोटे से कस्बे से लेकिन तरक्की की मार ने इनका चेहरा कुछ बदल दिया..........शायद इसी लिए मेरी पहचान अब यहाँ हल्की पड़ चुकी थी।
और मैं आज भी ढूंढ रहा था कुछ अक्स उन गलियों में~
जहां कभी यारों की महफिल जमा करती थी,
परेशानियां,माथे की शिकन,आँखों की नमी
सब,मुस्कुराहट के आगे दम तोड़ दिया करती थी
आवारा पंछी थे सब~ न गुजरे वक्त का मलाल न कल की फिक्र ।
बांटते ऐसे थे मानों पुश्तैनी जायदाद का हिस्सा हो फिर चाहे वो किसी के गम हों या सिगरेट और बोतल।
बाइक को छोटी तंग गलियों में रोकट की तरह उड़ाते हुए शोर मचाकर आधी रात को सबको जगाना
न्यू इयर पर रातभर जिम में दोस्तों के साथ बैठकर पार्टी करना ,
रात को देरी से घर की दीवार कूदकर जाना और सुबह एक दूसरे को आपबीती सुनाकर दिनभर हंसना ,,लगता है मानो कल की ही तो बातें हैं सब लेकिन कहाँ गए वो हाथ जो कभी इन कंधो पर हुआ करते थे______
एक ही डाल के पत्ते थे सब,कब सूखे , कब वक्त की आँधी चली और उड़ाकर कहाँ ले गई कुछ पता न चला ।।
लेकिन कुछ हिस्से आज भी हरे हैं यादें बनकर,शायद इसी उम्मीद में कि न जाने किस रोज एक झौंका किस्मत का एक जगह कर दे सबको _______
एक बार फिर जिंदगी जीने के लिए,शहर के ट्रैफिक से दूर गाँव की खुली हवा में सांस लेने के लिए....
जहां बस रुकती है वहाँ कस्बा है एक छोटा सा,मेरे बचपन का या कहिए कुछ पुरानी यादों का कस्बा, और उस पार गाँव ।।
पहुंचते- पहुंचते रात काफी हो चुकी थी ......
गलियाँ सुनसान और निर्जन हो गई थी.
स्वागत को सिर्फ स्ट्रीट लाइट की हल्की रोशनी बची थी,यूं तो काफी जानकारी है इस छोटे से कस्बे से लेकिन तरक्की की मार ने इनका चेहरा कुछ बदल दिया..........शायद इसी लिए मेरी पहचान अब यहाँ हल्की पड़ चुकी थी।
और मैं आज भी ढूंढ रहा था कुछ अक्स उन गलियों में~
जहां कभी यारों की महफिल जमा करती थी,
परेशानियां,माथे की शिकन,आँखों की नमी
सब,मुस्कुराहट के आगे दम तोड़ दिया करती थी
आवारा पंछी थे सब~ न गुजरे वक्त का मलाल न कल की फिक्र ।
बांटते ऐसे थे मानों पुश्तैनी जायदाद का हिस्सा हो फिर चाहे वो किसी के गम हों या सिगरेट और बोतल।
बाइक को छोटी तंग गलियों में रोकट की तरह उड़ाते हुए शोर मचाकर आधी रात को सबको जगाना
न्यू इयर पर रातभर जिम में दोस्तों के साथ बैठकर पार्टी करना ,
रात को देरी से घर की दीवार कूदकर जाना और सुबह एक दूसरे को आपबीती सुनाकर दिनभर हंसना ,,लगता है मानो कल की ही तो बातें हैं सब लेकिन कहाँ गए वो हाथ जो कभी इन कंधो पर हुआ करते थे______
एक ही डाल के पत्ते थे सब,कब सूखे , कब वक्त की आँधी चली और उड़ाकर कहाँ ले गई कुछ पता न चला ।।
लेकिन कुछ हिस्से आज भी हरे हैं यादें बनकर,शायद इसी उम्मीद में कि न जाने किस रोज एक झौंका किस्मत का एक जगह कर दे सबको _______
बहुत सही कहा। हर कोई सालो के बाद गांव जाने पर यही सोचते है परन्तु कोई वहा रहना नहीं चाहता। हर कोई संपन्न होना चाहता है और इसलिए गांव बदल रहा है।
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